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The Biology of Prenatal Development




प्रसूतिपूर्व विकास का जीवविज्ञान

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The Fetal Period (8 Weeks through Birth)

Chapter 37   9 Weeks: Swallows, Sighs, and Stretches

गर्भस्थ शिशु की अवधि जन्म तक चलती है।

9वें सप्ताह से शिशु अंगूठा चूसना आरंभ करता है तथा गर्भस्थ शिशु गर्भावरण द्रव्य को निगल सकता है।

गर्भस्थ शिशु किसी वस्तु को भी ले सकता है। अपने सिर को आगे पीछे हिला सकता है, अपने जबड़े खोल और बंद कर सकता है, जीभ हिला सकता है, सांस भर सकता है और तन सकता है।

चेहरे के स्नायु संग्राहक, हाथों की हथेलियां तथा पैरों के तलवे हल्का स्पर्श महसूस कर सकते हैं।

पैर के तलवे पर हलके स्पर्श की प्रतिक्रियास्वरूप गर्भस्थ शिशु नितंब और घुटने को मोड़ सकता है तथा पैर के अंगूठे मोड़ सकता है।

पलकें अब पूरी तरह बंद हो गई हैं

कंठ में वाक् स्नायु दिखाई देने से स्वरतंत्र के विकास का पता चलता है।

बालिका शिशु में गर्भाशय की पहचान होने लगती है और अपरिपक्व प्रजनन कोशिकाएं, जिन्हें ऊगोनिया कहते हैं, गर्भाशय के अंदर प्रतिवलित होती हैं।

बाहरी लिंग से उनकी पहचान होने लगती है। कि वह लड़की है या लड़का

Chapter 38   10 Weeks: Rolls Eyes and Yawns, Fingernails & Fingerprints

9 और 10 सप्ताह के बीच भारी विकास होता है। शरीर का भार 75% से अधिक बढ़ जाता है।

दस सप्ताह में ऊपरी पलक में उत्तेजना आती है। इससे आंख नीचे की ओर घूमती है।

गर्भस्थ शिशु जम्हाई लेता है और प्रायः मुंह खोलता और बंद करता है।

अधिकांश गर्भस्थ शिशु दाहिना अंगूठा चूसते हैं।

नाभिनाल के भीतर आंत का हिस्सा पेट के रंध्र में वापस चला जाता है।

अधिकांश हड्डियों का निर्माण शुरू हो जाता है।

हाथ और पैर की अंगुलियों के नाखूनों का विकास आरंभ होता है।

गर्भाधान के 10 सप्ताह बाद अंगुलियों के अनूठे निशान दखाई देते हैं। इन निशानों को जीवनभर पहचान के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।

Chapter 39   11 Weeks: Absorbs Glucose and Water

11वें सप्ताह से नाक और होंठों का पूरी तरह निर्माण हो जाता है। मानव जीवन चक्र के साथ प्रत्येक शरीर के अन्य अंग का रूपरंग बदलेगा।

गर्भस्थ शिशु द्वारा निगले गए ग्लूकोज़ और पानी को उसकी आंत सोखने लगती है।

यद्यपि गर्भाधान के बाद ही लिंग का पता चल जाता है लेकिन अब साफतौर पर बाहरी लिंग से लड़की या लड़के की पहचान हो सकती है।

Chapter 40   3 to 4 Months (12 to 16 Weeks): Taste Buds, Jaw Motion, Rooting Reflex, Quickening

11 और 12 सप्ताह के बीच गर्भस्थ शिशु का भार लगभग 60% बढ़ जाता है

12 सप्ताह गर्भावस्था का एक तिहाई भाग या तिमाही होता है।

मुंह के अंदर अब अलग-अलग स्वाद के मुकुल विकसित होते हैं।
जन्म से स्वाद मुकुल केवल जीभ और मुंह के तल पर रहेंगे।

12 सप्ताह से ही आंत्र की गतिविधि शुरू होती है और लगभग 6 सप्ताह तक जारी रहती है।

गर्भस्थ शिशु और नवजात कोलन द्वारा निकाले गए पहले पदार्थ को मेकोनियम कहते हैं। यह पाचक एनज़ाइमों प्रोटीन और मृत कोशिकाओं से बना होता है जोकि पाचक नाल द्वारा छोड़ी जाती हैं।

12 सप्ताह से ऊपरी हिस्से की लंबाई लगभग शरीर के आकार के अंतिम अनुपात में पहुंच जाती है। निचले हिस्से को अपने अंतिम अनुपात में पहुंचने में थोड़ा समय लगता है।

पीठ और सिर के ऊपरी हिस्से को छोड़कर गर्भस्थ शिशु का पूरा शरीर अब हल्के स्पर्श पर प्रतिक्रिया करता है।

लिंग के आधार पर विकास में अंतर पहली बार दिखाई देता है। उदाहरण के लिए बालिका गर्भस्थ शिशु जबड़े को बालक शिशु से अधिक बार चलाता है।

जैसेकि पहले प्रतिक्रिया देखी गई कि शिशु प्रतिक्रिया स्वरूप मुंह खींच लेता था इसके मुकाबले अब वह मुंह के नजदीक प्रेरित करने से मुंह खोलता है। इस प्रतिक्रिया को रूटिंग रिफ्लेक्स कहते हैं और यह जन्म के बाद भी चलती रहती है। इससे नवजात को स्तनपान के समय अपनी माता के स्तनाग्र ढूंढने में सहायता मिलती है।

चेहरा परिपक्व होता जाता है और गालों में भराव होना शुरू होता है तथा दांतों का विकास होने लगता है।

पंद्रहवें सप्ताह से रक्त निर्माण संबंधी कोशिकाएं बननी शुरू होती हैं और बोनमैरो में उनकी संख्या बढ़ती जाती है। अधिकांश रक्त कोशिकाओं का निर्माण यहीं होता है।

यद्यपि 6 सप्ताह के भ्रूण में ही हलचल होने लगती है किंतु एक गर्भवती महिला को 14 से 18 सप्ताह के बीच गर्भस्थ शिशु की गतिविधि का एहसास होता है। परंपरागत रूप से इस घटनाचक्र को क्विकनिंग बोलते हैं।

Chapter 41   4 to 5 Months (16 to 20 Weeks): Stress Response, Vernix Caseosa, Circadian Rhythms

सोलहवें सप्ताह से गर्भस्थ शिशु के पेट में सूई चुभोने की प्रक्रिया से हारमोन संबंधी दबाव की प्रतिक्रिया दिखाई देती है और रक्तधारा में नॉरएड्रीनेलाइन, या नॉरएपिनेफ्राइन का स्त्राव होता है। नवजात और वयस्क व्यक्ति में आघात प्रक्रिया के कारण इसी प्रकार की प्रतिक्रिया होती है।

श्वसन प्रणाली में श्वसन संबंधी नलिकाएं लगभग पूरी बन जाती हैं।

वर्निक्स कसोसा कहे जाने वाला एक सफेद पदार्थ अब गर्भस्थ शिशु को लपेट देता है। वर्निक्स गर्भावरण के द्रव्य से होने वाले प्रदाहक प्रभाव से रक्षा करता है।

19वें सप्ताह से गर्भस्थ शिशु का हिलना डुलना, उसकी श्वसन क्रिया और दिल की धड़कन दर दैनिक चक्र के अनुसार चलती है जिसे सरकैडियन रिद्म कहते हैं।

Chapter 42   5 to 6 Months (20 to 24 Weeks): Responds to Sound; Hair and Skin; Age of Viability

20वें सप्ताह से कर्णावर्त जोकि श्रवण अंग होते हैं परिपक्व आकार ग्रहण करते हैं। जिसके भीतर पूरी तरह आंतरिक कान विकसित हो जाता है। इसके बाद से गर्भस्थ शिशु ऊंची ध्वनि के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा।

खोपड़ी में बाल उगने शुरू होते हैं।

त्वचा की सभी परतें और बालों के रोमकूपों तथा ग्रंथियों सहित सभी संरचनाएं प्रकट होने लगती हैं।

गर्भाधान के 21 से 22 सप्ताह तक फेफड़ों में सांस लेने की कुछ क्षमता आ जाती है। इसे जीवन क्षमता की अवस्था के रूप में जाना जाता है, क्योंकि कुछ गर्भस्थ शिशु गर्भ के बाहर भी जीने लायक बन पाते हैं। चिकित्सा क्षेत्र में सफल खोजों के कारण अपरिपक्व जन्मे शिशुओं को ज़िंदा रखना भी संभव हो रहा है।

Chapter 43   6 to 7 Months (24 to 28 Weeks): Blink-Startle; Pupils Respond to Light; Smell and Taste

24 सप्ताह में गर्भस्थ शिशु पलकें पुनः खोलता है और उसमें पलक झपकने की अनूठी प्रतिक्रिया विकसित होती है। अचानक तेज़ ध्वनि के प्रति प्रतिक्रिया बालिका गर्भस्थ शिशु में कुछ पहले विकसित हो जाती है।

अनेक खोजकर्त्ताओं ने सूचना दी है कि ऊंची ध्वनि से गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है। तत्काल प्रभावों में लंबे समय तक दिल की धड़कन दर बढ़ना, गर्भस्थ शिशु द्वारा अधिक द्रव्य निगलना और अचानक व्यवहार में परिवर्तन शामिल हैं। संभावित दीर्घावधि परिणामों में बहरा होना भी शामिल है।

गर्भस्थ शिशु की सांस लेने और सांस छोड़ने की गति प्रति मिनट 44 बार तक पहुंच सकती है।

गर्भावस्था की तीसरी तिमाही के दौरान मस्तिष्क में तेजी से वृद्धि होने के कारण गर्भस्थ शिशु द्वारा प्रयोग की जाने वाली ऊर्जा का 50% से अधिक भाग इसमें लग जाता है। मस्तिष्क का भार 400 से 500% के बीच बढ़ जाता है।

26 सप्ताह से आंखों में आंसू तैयार हो जाते हैं।

पुतलियां 27 सप्ताह में प्रकाश की प्रतिक्रिया दिखाती है यह प्रतिक्रिया जीवनभर दृष्टिपटल तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा को विनियमित करती है।

सूंघने की इंद्री सक्रिय होने के लिए आवश्यक सभी अवयव कार्य करने लगते हैं। अपरिपक्व जन्मे शिशुओं के अध्ययन से पता चलता है कि उनमें गर्भाधान के सिर्फ 26 सप्ताह बाद ही गंध सूंघने की क्षमता विकसित हो जाती है।

गर्भावरण के द्रव्य में कोई मीठा पदार्थ रखने से गर्भस्थ शिशु द्वारा निगलने की दर बढ़ जाती है। इसके विपरीत, कोई कड़वा पदार्थ रखने से निगलने की गति घट जाती है। चेहरे की अभिव्यक्तियां प्रायः बदलती रहती हैं।

गर्भस्थ शिशु घूमने जैसे पैरों को चलाकर कलाबाज़ियां दिखाता है।

गर्भस्थ शिशु में कम झुर्रियां दिखाई देती हैं चूंकि त्वचा के नीचे अतिरिक्त वसा भर जाती है। वसा शरीर के तापमान को बनाए रखने और जन्म के पश्चात ऊर्जा भंडारण में भूमिका अदा करती है।

Chapter 44   7 to 8 Months (28 to 32 Weeks): Sound Discrimination, Behavioral States

28 सप्ताह में गर्भस्थ शिशु धीमी और ऊंची आवाज़ पहचानने लगता है।

30 सप्ताह से सांस लेने की गतिविधि सामान्य हो जाती है और किसी औसतन गर्भस्थ शिशु में यह क्रिया 30 से 40% तक होती है।

गर्भावस्था के अंतिम चार महीनों के दौरान गर्भस्थ शिशु बीच-बीच में आराम करते हुए समन्वित क्रियाएं करता है। ये व्यवहार संबंधी अवस्थाएं केंद्रीय स्नायुतंत्र की बढ़ती हुई जटिलताओं को प्रदर्शित करती हैं।

Chapter 45   8 to 9 Months (32 to 36 Weeks): Alveoli Formation, Firm Grasp, Taste Preferences

लगभग 32 सप्ताह से फेफड़ों में ट्रू एलवियोली या एयर पॉकेट कोशिकाएं विकसित होने लगती हैं। वे जन्म के 8 वर्ष बाद तक बनती रहती हैं।

35 सप्ताह में गर्भस्थ शिशु हाथ की जकड़ मजबूत होती है।

गर्भस्थ शिशु को विभिन्न पदार्थों के सेवन से जन्म के बाद स्वाद के प्रति उसकी रुचि निर्धारित करता है उदाहरण के लिए यदि किसी गर्भस्थ शिशु की माता ने सौंफ खाई है जिसका स्वाद मुलैठीदार होता है तो बच्चे ने भी सौंफ के प्रति रुचि दिखाई है। जिस गर्भस्थ शिशु ने सौंफ का स्वाद नहीं

Chapter 46   9 Months to Birth (36 Weeks through Birth)

गर्भस्थ शिशु एस्ट्रोजन नामक हालोन का अधिक स्त्राव करके प्रसव दर्द शुरू करता है और इस प्रकार गर्भस्थ शिशु से नवजात शिशु तक की यात्रा तय होती है।

प्रसव दर्द में गर्भाशय में अत्यधिक संकुचन होता है जिससे बच्चे का जन्म होता है।

गर्भाधान से बच्चे के जन्म तक और उसके पश्चात मानव विकास गतिशील, जारी रहता है और इसमें जटिलता बढ़ती जाती है। इस आकर्षक प्रक्रिया के संबंध में नई खोजों से अधिकाधिक पता चलता है कि गर्भस्थ शिशु के विकास का जीवनपर्यंत स्वास्थ्य पर महत्वपूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।

जैसे जैसे मानव के शुरुआती विकास के संबंध में हमारी समझ बढ़ती जाएगी वैसे वैसे जन्म से पूर्व और जन्म के बाद स्वास्थ्य संवर्धन में हमारी क्षमता बढ़ेगी।


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